जिस पिता ने 4 बच्चों को पालकर बड़ा किया, मौत पर वही बच्चे नहीं आए! भोपाल के वृद्धाश्रम में 70 साल के घनश्याम का शव अपनों का करता रहा इंतजार

 


भोपाल। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से रिश्तों को झकझोर देने वाला मामला सामने आया है। यहां ‘अपना घर’ वृद्धाश्रम में रह रहे 70 वर्षीय घनश्याम सिंह की मौत के बाद उनके अपने ही अंतिम संस्कार के लिए नहीं पहुंचे। वृद्धाश्रम प्रबंधन ने परिजनों को पिता की मौत की सूचना दी, लेकिन परिवार के सदस्यों ने आने से इनकार कर दिया। यहां तक कि परिजनों की ओर से कहा गया कि आप ही अंतिम संस्कार कर दीजिए और डेथ सर्टिफिकेट हमें भेज दीजिए।

पत्नी की मौत के बाद अकेले बच्चों को पाला

रिपोर्ट के मुताबिक घनश्याम सिंह मूल रूप से इंदौर के रहने वाले थे। पत्नी की मौत के बाद उन्होंने अपने चार बच्चों का पालन-पोषण किया। जिंदगी के आखिरी वर्षों में वे भोपाल के ‘अपना घर’ वृद्धाश्रम में रहने लगे। अलग-अलग रिपोर्ट्स में उनके वृद्धाश्रम में रहने की अवधि करीब ढाई से चार साल बताई गई है।

घनश्याम गंभीर बीमारी से भी जूझ रहे थे। एक रिपोर्ट के अनुसार उनके गाल में गंभीर बीमारी थी और वे बोल पाने में असमर्थ थे। बीमारी और अकेलेपन के बीच उनका आखिरी समय वृद्धाश्रम में ही बीता।

मौत की खबर सुनकर भी नहीं पहुंचे बच्चे

घनश्याम सिंह का वृद्धाश्रम में बीमारी के चलते निधन हो गया। इसके बाद ‘अपना घर’ की संचालिका माधुरी मिश्रा ने उनके परिजनों से संपर्क किया। पहले बेटी को फोन कर पिता के निधन की जानकारी दी गई। बेटी ने कहा कि उसका पिता से कोई वास्ता नहीं है और उसने बेटों से बात करने को कहा।

इसके बाद जब बेटों से संपर्क किया गया तो उन्होंने भी भोपाल आने से इनकार कर दिया। परिजनों की ओर से कथित तौर पर वृद्धाश्रम प्रबंधन से कहा गया कि अंतिम संस्कार करवा दें और बाद में डेथ सर्टिफिकेट भेज दें।

दो दिन तक अपनों का इंतजार करता रहा शव

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार घनश्याम की मौत के बाद उनका शव करीब दो दिन तक अपनों के इंतजार में रखा रहा। उम्मीद थी कि शायद परिवार का कोई सदस्य आएगा और पिता को अंतिम विदाई देगा, लेकिन कोई नहीं पहुंचा।

आखिरकार वृद्धाश्रम प्रबंधन को ही अंतिम संस्कार की व्यवस्था करनी पड़ी। पुलिस की मदद से भोपाल के भदभदा विश्राम घाट पर घनश्याम सिंह का रीति-रिवाज के साथ अंतिम संस्कार किया गया।

एक पिता की जिंदगी और अंत पर बड़ा सवाल

घनश्याम सिंह की कहानी सिर्फ एक बुजुर्ग की मौत की कहानी नहीं है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा करती है कि जिन बच्चों को माता-पिता जीवनभर पालते हैं, क्या बुढ़ापे में उनकी जिम्मेदारी से इस तरह मुंह मोड़ा जा सकता है? एक ओर घनश्याम ने पत्नी की मौत के बाद अकेले अपने बच्चों को बड़ा किया, वहीं जीवन के अंतिम पड़ाव में उन्हें परिवार का साथ नहीं मिला।

यह घटना बुजुर्गों की देखभाल, पारिवारिक जिम्मेदारी और तेजी से बदलते सामाजिक रिश्तों पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है।

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