नई दिल्ली में BRICS शिखर सम्मेलन के बीच भारत और चीन के व्यापारिक रिश्ते एक बार फिर चर्चा में हैं। वित्त वर्ष 2025-26 में दोनों देशों के बीच वस्तु व्यापार करीब 151 अरब डॉलर तक पहुंच गया है।
चीन बना भारत का सबसे बड़ा कारोबारी साझेदार, 151 अरब डॉलर का व्यापार; लेकिन भारत का घाटा 112 अरब डॉलर के पार
नई दिल्ली। भारत और चीन के बीच व्यापारिक रिश्तों में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। वित्त वर्ष 2025-26 में दोनों देशों के बीच वस्तुओं का कुल व्यापार करीब 151.1 अरब डॉलर तक पहुंच गया। चीन ने अमेरिका को पीछे छोड़ते हुए भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बनने में सफलता हासिल की है।
हालांकि, इस बढ़ते कारोबार की सबसे बड़ी चिंता भारत का व्यापार घाटा है। भारत ने चीन से करीब 131.63 अरब डॉलर का सामान आयात किया, जबकि चीन को भारत का निर्यात लगभग 19.47 अरब डॉलर रहा। यानी दोनों देशों के व्यापार में भारत का घाटा करीब 112.16 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो अब तक का सबसे बड़ा स्तर है।
चीन से क्या खरीद रहा है भारत?
चीन से भारत को मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक्स, कंप्यूटर, इंटीग्रेटेड सर्किट, टेलीकॉम उपकरणों के पुर्जे, लिथियम-आयन बैटरी और उर्वरक समेत कई महत्वपूर्ण उत्पाद मिलते हैं। इनमें से कई सामान भारतीय उद्योगों और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए महत्वपूर्ण हैं।
दूसरी ओर भारत से चीन को मुख्य रूप से आयरन ओर, लाइट नैफ्था, पी-जाइलीन, झींगा और कैस्टर ऑयल जैसी वस्तुओं का निर्यात होता है। भारत की कोशिश है कि चीन के बाजार में भारतीय उत्पादों की पहुंच बढ़े और व्यापार असंतुलन कम हो।
मोदी-जिनपिंग मुलाकात से उम्मीदें
इसी आर्थिक पृष्ठभूमि के बीच चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग सात साल बाद भारत पहुंचे हैं। BRICS सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग के बीच बातचीत हो रही है। दोनों देशों के बीच व्यापार घाटा, बाजार तक पहुंच, निवेश और सप्लाई चेन जैसे मुद्दे अहम माने जा रहे हैं।
भारत और चीन के रिश्तों में 2020 के गलवान संघर्ष के बाद तनाव बढ़ गया था। इसके बाद निवेश, कारोबार और लोगों की आवाजाही पर कई तरह के प्रतिबंध और अड़चनें आईं। अब दोनों देशों के बीच रिश्तों में धीरे-धीरे सुधार के संकेत दिखाई दे रहे हैं। भारत ने चीन से सीधी उड़ानें फिर शुरू की हैं और चीनी पेशेवरों के बिजनेस वीजा से जुड़ी प्रक्रियाओं में भी कुछ आसानी की है।
हालांकि भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि चीन के साथ कारोबार बढ़ने के बावजूद आयात और निर्यात के बीच भारी अंतर बना हुआ है। आने वाले समय में दोनों देशों के बीच बातचीत का एक महत्वपूर्ण लक्ष्य इसी व्यापार असंतुलन को कम करना हो सकता है।

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