रमाबाई जब दौड़ में पहुंचीं तो उन्होंने साड़ी और चप्पल पहन रखी थी। दौड़ शुरू होने के बाद कीचड़ और असमान रास्ते के कारण उनकी चप्पल बार-बार फिसलने लगी। उन्होंने रुकने के बजाय चप्पल हाथ में ली और नंगे पैर दौड़ना शुरू कर दिया। रास्ते में पत्थरों और मुश्किलों के बावजूद उन्होंने अपनी रफ्तार बनाए रखी।
सबसे खास बात यह रही कि रमाबाई ने कई युवा प्रतिभागियों को पीछे छोड़ते हुए मैराथन में पहला स्थान हासिल किया। जीत के बाद उन्हें ₹3,000 और ट्रॉफी मिली। रमाबाई ने बताया कि वह पुरस्कार की रकम अपनी बेटियों की पढ़ाई और किताबों पर खर्च करेंगी।
रमाबाई के पति की मौत के बाद परिवार और दो बेटियों की जिम्मेदारी उन्हीं पर है। वह अंबाजोगाई में खाना बनाने का काम करती हैं। उनकी बेटियां पढ़ाई के साथ प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रही हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, उनकी एक बेटी पुलिस भर्ती की तैयारी कर रही है, जबकि दूसरी बैंकिंग परीक्षा की तैयारी में जुटी है।
रमाबाई के लिए यह सिर्फ एक मैराथन नहीं थी। उनके सामने मंजिल सिर्फ फिनिश लाइन नहीं, बल्कि बेटियों का बेहतर भविष्य था। उनकी नंगे पैर दौड़ती तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर लोगों का ध्यान खींच रहे हैं।

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