देश में चीनी की बढ़ती कीमतों ने सरकार की चिंता बढ़ा दी है। पिछले करीब दो महीनों में घरेलू चीनी की कीमतों में करीब 40% तक की तेजी देखी गई है। बढ़ती कीमतों और त्योहारों से पहले मांग बढ़ने की आशंका के बीच केंद्र सरकार ने बड़ा फैसला लिया है।
सरकार ने 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची चीनी को बिना आयात शुल्क के मंगाने की अनुमति दी है। यह आयात 31 अक्टूबर 2026 तक किया जा सकेगा। सरकार का मकसद घरेलू बाजार में सप्लाई बढ़ाना और कीमतों को नियंत्रित करना है।
आखिर चीनी महंगी क्यों हुई?
इस साल चीनी उत्पादन के अनुमान में बड़ी कटौती हुई है। सरकार के मुताबिक मौजूदा सीजन में उत्पादन करीब 306 लाख टन रहने का अनुमान है, जबकि शुरुआती अनुमान 343 लाख टन था। यानी उत्पादन अनुमान से करीब 11% कम रहने की संभावना है। महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश जैसे प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों में मौसम और फसल को हुए नुकसान को इसका प्रमुख कारण बताया गया है।
इसके साथ ही त्योहारों से पहले चीनी की मांग बढ़ने वाली है। सरकार ने बाजार में जमाखोरी और सट्टेबाजी पर रोक लगाने के लिए पहले ही चीनी कारोबारियों के स्टॉक पर सीमा लगाई थी। सरकार ने कहा था कि कुछ कारोबारियों की जमाखोरी और बिना वास्तविक माल की खरीद-बिक्री से कृत्रिम कमी का माहौल बना और कीमतों में तेजी आई।
एथेनॉल को लेकर भी सियासत
चीनी के दाम बढ़ने के पीछे एथेनॉल के लिए गन्ने के इस्तेमाल को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। हालांकि केंद्र सरकार ने साफ किया है कि मौजूदा कीमत बढ़ोतरी की वजह एथेनॉल के लिए चीनी का डायवर्जन नहीं है और इस साल एथेनॉल उत्पादन के लिए इस्तेमाल होने वाली चीनी पिछले वर्षों की तुलना में कम है।
22 अगस्त को सरकार के आंकड़ों के मुताबिक चीनी का अखिल भारतीय औसत थोक भाव ₹5,570.22 प्रति क्विंटल था।
यानी सरकार अब एक तरफ आयात बढ़ाकर सप्लाई सुधारने और दूसरी तरफ जमाखोरी पर लगाम लगाकर चीनी की कीमतों को काबू करने की कोशिश कर रही है।

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